गीत @@
शहरों की आवाजाही ने
गाँव बिगाड़ा है।
डामर गिट्टी सनी सड़क यह
अजगर सी सोयी
छिन्न भिन्न अस्तित्व हीन सी
पगडंडी रोयी।
पथिक छाँव पाते पथ का वह
नीम उखाड़ा है।
इकलौती बस से भिन्सारे
कीरत जाता है
और उसी मोटर से संझा
वापस आता है
मजदूरी का एक फीसदी
लगता भाड़ा है।
टिका गया हर माल खोट का
दलपत सस्ते में
गुटका, पाउच, मिलते अब
बच्चों के बस्ते में
युवा-मनों पर अवसादों ने
झंडा गाड़ा है।
#राजेंद्र श्रीवास्तव #
No comments:
Post a Comment