नवगीत
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खुशियाँ,जगह बनाएँ कैसे?
मन में बैठा डर!
सोने नहीं तनिक भी देती
सोने की लंका।
जाने कौन! फूँक कर जाए
रहती आशंका।
गहरी होती रहीं लकीरें
चिंतित माथे पर।
मन में बैठा डर।
आशा कहीं रूठ कर बैठी
जब विश्वास गया।
आ जाता है डर का कोई
रिश्तेदार नया।
जाता नहीं, बना लेता फिर
घर के भीतर घर।
मन में बैठा डर।
अमर बेल सा फैल रहा यह
कुछ करना होगा
जीवित रखा अगर इसको, तो
खुद मरना होगा।
खड़ी सफलताएँ द्वारे पर-
डर को कर बाहर।
मन में बैठा डर
#राजेन्द्र श्रीवास्तव #
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