गीत
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कतरा-कतरा मिलकर हम
दरिया बन जाएँगे ।
घाटी से मैदानों की
हम राह पकड़ लेंगे
ऊबड़-खाबड़ दुर्गम पथ
को समतल कर देंगे
अवरोधों के पर्वत भी -
फिर नजर न आएँगे ।
कतरा-कतरा मिलकर हम
दरिया बन जाएँगे ।
छोटे या नगण्य भी जब
अपनी पर आते हैं।
उँगली-उँगली मिल कर तब
मुठ्ठी बन जाते है।
भिंची हुई मुठ्ठियाँ लिए
आक्रोश जताएँगे ।
कतरा-कतरा मिलकर हम
दरिया बन जाएँगे ।
कतरे को यदि सीप मिले
तो मोती बन जाए
बूँद-बूँद के संग्रह से
खाली घट भर जाए।
बह जाएँगे नयनों से
आँसू कहलाएँगे।
कतरा-कतरा मिलकर हम
दरिया बन जाएँगे ।
***. #राजेन्द्र श्रीवास्तव #
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