Thursday, 25 October 2018

एक गीत


  
🌕
पूरनमासी चाँद शरद का
लगता कितना प्यारा
खोज रहा है किसे? गगन में
व्याकुल मन-बंजारा।
      🌕
साँझ ढले से नीलगगन का
लगा रहा है फेरा 
होश नहीं है निशा गयी कब
कब आ गया सबेरा।
आशाओं के साथ डूबता
चला भोर का तारा।
पूरनमासी चाँद शरद का
लगता कितना प्यारा।
                🌕
निर्मल सी चाहत चकोर की
शशि ने कब पहिचानी
अनदेखा कर रहा प्रीत को
  निर्मोही अभिमानी
  उठा रहा लहरें रह-रह कर
  आकुल सागर  खारा।
  पूरनमासी चाँद शरद का
  लगता कितना प्यारा।
                        🌕
    धवल चाँदनी धन्य धरा पर
    मुक्त हस्त फैलाता
    छिटक रहे मेघों में जाकर
    फिर कुछ पल छिप जाता।
    आज लुटा देगा अवनि पर
    यह  नेहामृत   सारा।
                            🌕 #राजेन्द्र श्रीवास्तव #

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