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पूरनमासी चाँद शरद का
लगता कितना प्यारा
खोज रहा है किसे? गगन में
व्याकुल मन-बंजारा।
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साँझ ढले से नीलगगन का
लगा रहा है फेरा
होश नहीं है निशा गयी कब
कब आ गया सबेरा।
आशाओं के साथ डूबता
चला भोर का तारा।
पूरनमासी चाँद शरद का
लगता कितना प्यारा।
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निर्मल सी चाहत चकोर की
शशि ने कब पहिचानी
अनदेखा कर रहा प्रीत को
निर्मोही अभिमानी
उठा रहा लहरें रह-रह कर
आकुल सागर खारा।
पूरनमासी चाँद शरद का
लगता कितना प्यारा।
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धवल चाँदनी धन्य धरा पर
मुक्त हस्त फैलाता
छिटक रहे मेघों में जाकर
फिर कुछ पल छिप जाता।
आज लुटा देगा अवनि पर
यह नेहामृत सारा।
🌕 #राजेन्द्र श्रीवास्तव #
Thursday, 25 October 2018
एक गीत
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