(बाल कविता)
मच्छर भाई
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'मच्छर भाई' - ' राम-राम,'
हाथ जोड़कर तुम्हें प्रणाम।
बड़े बड़े तुम से डरते हैं
कहने को छोटा है नाम।
तुम कितने दुबले पतले हो
हड्डी का न नाम निशान।
लेकिन बड़े पहलवानों की-
कर देते आफत में जान।
रोटी दाल-भात न खाते
मीठा देख नहीं ललचाते।
धीमे से भी फूँक दिया तो-
पूरे पाँच फीट उड़ जाते।
पास हमारे जब भी आते
सारे रोम खड़े हो जाते।
नानी याद हमे आ जाती -
जब तुम भन-भन-भन भन्नाते।
जहाँ है कीचड़, पानी, घास-
वही तुम्हारा प्रिय आवास।
जो स्वच्छ रखते घर अपना -
उनके नहीं फटकते पास।
दिल्ली हो या देहरादून
जब आता है तुम्हें जुनून।
होकर मस्त रात-दिन गाते-
चूस चूस कर सबका खून।
उड़ते रहते हो दिन-रैन
तुमको आता नहीं है चैन।
फैलाते हो रोग मलेरिया -
खाना पड़ती हमे कुनैन।
मच्छर दानी से टकराते
लेकिन भीतर पहुँच न पाते
हर कोशिश निष्फल हो जाती
बाहर रह जाते भन्नाते।
राजेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव
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