Tuesday, 11 September 2018

नवगीत

नवगीत
@@

मुनिया पन्नी बीन रही

खाने और खेलने के दिन-
अभी उमर है पढ़ने की।
इन भोली प्यारी आँखों में
सुन्दर सपने गढ़ने की।
मगर गरीबी कदम-कदम पर
उसके सपने छीन रही।

मुनिया पन्नी बीन रही।

कोशिश की है कदम-कदम पर -
सतत भूख  से लड़ने की।
रही लालसा उसके मुँह पर-
चार तमाचे जड़ने की।
हर कोशिश फिलहाल, ढाक के -
पत्तों जैसी तीन रही।

मुनिया पन्नी बीन रही।

शिक्षा और ज्ञान की उसकी
अपनी ही है परिभाषा।
आँखों से ही पढ़ लेती वह
चेहरे की हर इक भाषा।
रहीं निगाहें आसमान पर
पैरों तले जमीन रही।

मुनिया पन्नी बीन रही।

सुनती रही बालिकाओं के-
हित की कई घोषणाएँ।
उसके घर की राह भूलकर
अटकीं कहीं योजनाएँ।
वह, उनके आने की आहट-
सुनने में तल्लीन रही।

मुनिया पन्नी बीन रही।

रही सोचती, कभी न आए
दुविधाओं का दोराहा।
आशाओं के आसमान में
उसने भी उड़ना चाहा।
उड़ने की आशाएँ पाले-
वह पंछी पर-हीन रही।

मुनिया पन्नी बीन रही।

         #राजेंद्र श्रीवास्तव #




No comments:

Post a Comment