नवगीत
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तय है , भूखे-प्यासे हैं
चपरासी के
दस पद हैंं
बहुत कठिन
इंटरव्यू है
दो हजार से
ज्यादा की-
अंत हीन
लम्बी क्यू है ।
ढली दोपहर
बिन भोजन-
क्यू में खड़े उपासे हैं।
तय है भूखे-प्यासे हैं।
बचपन के
संगी-साथी,
गाँव-गली सब,
बिसर गये।
रोजगार की
आशा में -
बने ठिकाने,
शहर नये।
धीरे-धीरे
खर्च हुए-
पैसे बचे जरा से हैं।
तय है भूखे-प्यासे हैं।
एक गाय-
दो बैल बिके,
बीघा भर का
खेत बिका।
विपदाओं का
यह कुनबा
जब से इस घर
आन टिका।
राहत के-
गिनती के पल
मिलते छठे-छ:-मासे हैं
तय है भूखे-प्यासे हैं।
#राजेंद्रश्रीवास्तव#
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