नवगीत
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धनीराम का खेत, गरीबा
पानी सींच रहा।
जहाँ खेत है, कभी वहाँ पर
छोटा जंगल था।
नदिया का गहरा निर्मल जल
बहता कल-कल था।
टुल्लु पम्प उन्ही खेतों में, नदी उलीच रहा।
धनीराम का खेत, गरीबा,पानी सींच रहा।
दूर गाँव की पगडंडी पर
बिजली का खम्भा।
वहीं हेकड़ी से लटका है
तार बहुत लम्बा।
बिन मीटर खम्भे से सीधे, बिजली खींच रहा।
धनीराम का खेत गरीबा, पानी सींच रहा।
दिन भर की मजदूरी फिर यह
बरवस बेगारी।
टुल्लु के पानी में बहती
रही रात सारी।
जाग रहा वह कभी नींद से, आँखें मींच रहा।
धनीराम का खेत गरीबा, पानी सींच रहा।
धनीराम आ कर बेमतलब
काम बढ़ाता है।
गाली देकर सात पुश्त की
याद दिलाता है।
मिट्टी सना गरीबा केवल, मुठ्ठी भींच रहा।
धनीराम का खेत गरीबा,पानी सींच रहा।
#राजेंद्र श्रीवास्तव #
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