Monday, 3 December 2018

नवगीत

मुन्ना अब मतदान करेगा
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छोड़ पलायन का स्वभाव वह
पिता, पितामह का।
मुन्ना अब मतदान करेगा
हुआ अठारह का।

नहीं किसी उत्सव से कम यह
अवसर आया है।
उसके लिए सैकड़ों आशा
सपने लाया है।
घूम रहा उत्साहित होकर वह चहका-चहका।
मुन्ना भी मतदान करेगा हुआ अठारह का।

उसने तय कर लिया परख कर-
वोट किसे देना।
यद्यपि प्रत्याशी सब आए
ले अपनी सेना।
मिले प्रलोभन, वादे लाखों नहीं मगर वहका।
मुन्ना भी मतदान करेगा हुआ अठारह का।

बूझ रहा वह, कौन जीत कर
जन-सेवा देगा
कौन जीत कर केवल अपनी
कोठी भर लेगा।
और कौन मन बना रहा है नौ दो ग्यारह का।
मुन्ना भी मतदान करेगा हुआ अठारह का।

मुनिया भी तो इसी बरस अब
हुई अठारह की।
मतदाता सूची से जुड़कर
वह भी तो चहकी।
यह उपकार नहीं,और न ही काम अनुग्रह का।
मुन्ना भी मतदान करेगा हुआ अठारह का।
                      #राजेंद्र श्रीवास्तव #

नवगीत

         नवगीत
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धनीराम का खेत, गरीबा
पानी सींच रहा।
जहाँ खेत है, कभी वहाँ पर
छोटा जंगल था।
नदिया का गहरा निर्मल जल
बहता कल-कल था।
टुल्लु पम्प उन्ही खेतों में, नदी उलीच रहा।
धनीराम का खेत, गरीबा,पानी सींच रहा।

दूर गाँव की पगडंडी पर
बिजली का खम्भा।
वहीं हेकड़ी से लटका है
तार बहुत लम्बा।
बिन मीटर खम्भे से सीधे, बिजली खींच रहा।
धनीराम का खेत गरीबा, पानी सींच रहा।

दिन भर की मजदूरी फिर यह
बरवस बेगारी।
टुल्लु के पानी में बहती
रही रात सारी।
जाग रहा वह कभी नींद से, आँखें मींच रहा।
धनीराम का खेत गरीबा, पानी सींच रहा।

धनीराम आ कर बेमतलब
काम बढ़ाता है।
गाली देकर सात पुश्त की
याद दिलाता है।
मिट्टी सना गरीबा केवल, मुठ्ठी भींच रहा।
धनीराम का खेत गरीबा,पानी सींच रहा।
                                   #राजेंद्र श्रीवास्तव #