Sunday, 4 November 2018

(गीत) आओ दीये ले जाओ

आओ दीये ले जाओ।

बाबू जी शुभ हो दीवाली, आओ दीये ले जाओ
लौट रहे हो खाली-खाली आओ दीये ले जाओ।

यह दीये चिकनी माटी के,और हमारी महनत के
लाएँगे घर में खुशहाली, आओ दीये ले जाओ।

इन दीपों को ले लो बाबू, थोड़ी सी कीमत देकर
जगमग हो पूजा की थाली,आओ दीये ले जाओ।

वैसे तो बाजार भरा है, तरह तरह के दीपों से
इन दीयों की बात निराली,आओ दीये ले जाओ।

इन्हें बेच कर खील बताशा और नारियल ले लूँगा.       और फुलझड़ी सस्ती  वाली ,आओ दीये ले  जाओ।

बच्चों को कपड़े ले लूँगा, वह भी खुश हो जाएँगे
नाचेंगे दे-दे कर ताली, आओ दीये ले जाओ।

किसी तरह बस थोड़े में हम, दीपावली मना लेंगे
जैसी पिछले साल मना ली,आओ दीये ले जाओ।
                      #राजेंद्र श्रीवास्तव #

Friday, 2 November 2018

गीत


गीत
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कतरा-कतरा मिलकर हम
दरिया बन जाएँगे ।

घाटी से मैदानों की
हम राह पकड़ लेंगे
ऊबड़-खाबड़ दुर्गम पथ
को समतल कर देंगे
अवरोधों के पर्वत भी -
फिर नजर न आएँगे ।

कतरा-कतरा मिलकर हम
दरिया बन जाएँगे ।

छोटे या नगण्य भी जब
अपनी पर आते हैं।
उँगली-उँगली मिल कर तब
मुठ्ठी बन जाते है।
भिंची हुई मुठ्ठियाँ लिए
आक्रोश जताएँगे । 

कतरा-कतरा मिलकर हम
दरिया बन जाएँगे ।

कतरे को यदि सीप मिले
तो मोती बन जाए
बूँद-बूँद के संग्रह से
खाली घट भर जाए।
बह जाएँगे  नयनों से
आँसू कहलाएँगे।

कतरा-कतरा मिलकर हम
दरिया बन जाएँगे ।
       ***.              #राजेन्द्र श्रीवास्तव #