Wednesday, 9 January 2019

बढते बाल अपराध, उत्तरदायी कौन?


(यह आलेख  पालकों के लिए चिंतन-मनन का एक अवसर देने के उद्देश्य से लिखा है।)

  बढ़ते बाल अपराध! उत्तरदायी कौन?

सर्वप्रथम नववर्ष पर विश्व के सभी नौनिहालों को बधाई व शुभकामना। ईश्वर उन्हें वह सभी सुख सुविधा लाड़ दुलाल दें, जिनके व जितने के वे हकदार हैं।
इतना कम भी नहीं कि समाज में उपेक्षित कहलाएँ और इतना ज्यादा भी नहीं समाज की ही उपेक्षा करने लगें।

      यह विषय निश्चित ही उद्देलित कर देता है।  बढ़ते बाल अपराधों के लिए क्या दोष केवल किसी एक का ही है?
उत्तर में सभी स्वीकार करेंगे, कि कहीं न कहीं इसकी जड़ में प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से पालक, शिक्षक व समाज सभी सम्मिलित हैं।

भौतिक सुख सुविधा जुटाने की जद्दोजहद में पारिवारिक वातावरण भी लगभग संवाद हीन व संवेदन शून्य होता जा रहा है। रिश्तों की मर्यादा
सांस्कृतिक व नैतिक मूल्य  बड़े ही भूल गये तो बच्चों को सिखाये कैसे?
बौद्धिक सफलता व प्रगति के मायने बदल गये। मानसिक विकास की परिभाषा बदल गयी। पालकों ने केवल बच्चों की हर माँग को पूरा करना ही अपना दायित्व मान लिया है। उचित अनुचित का बोध यदि है, तो भी बच्चों को विश्वास में लेकर समझाना उचित नहीं समझा। एक अंधी दौड़ में शामिल होना मानो बाध्यता है, विवशता है।

बच्चों की हर डिमांड पूरा करने के एवज में आशा-अपेक्षा का पिटारा उसके आगे खोल दिया जाता है। अविकसित समझ, अपरिपक्व बुद्धि, करे तो क्या करे? उसके हमउम्र दोस्त भी तो उसके जैसे ही हैं। कोचिंग सेंटर, विद्यालय केवल किताबी ज्ञान का लाइव-टेलीकास्ट मात्र रह गया। संप्रेषण कितना हुआ? व्यवहारिक कितना है? अवधारण स्पष्ट हुई या नहीं?
यह जानने समझने का काम क्या इन संस्थानों का नहीं माना जाता?
इज दैट क्लियर? अंडरस्टैण्ड,? ओ. के! ठीक है! बस यही गूँजते रह जाते हैं।
बच्चा भी उस भीड़ के देखादेखी "यस सर, यस मेम" कहना सीख लेता है। रही सही कसर समाज अर्थात हम आप पूरी कर देते  हैं। बच्चा चाकू खरीद रहा है! क्यों? यह प्रश्न क्या दुकानदार के मन में आया होगा?
काश! पूछा होता उससे कि क्या करोगे इतने बड़े चाकू का? क्यों पूछे!!!! वैसे भी गिने चुने ग्राहक। उन्हें भी हाथ से जाने दें!

पिता ने भी जानने की कोशिश नहीं की कि क्या करता है इतने पैसौं का? बस्ता में किताबों के साथ और क्या रखता है उनका लाडला?
क्यों देखें? बच्चा बड़ा हो गया  है! बड़े स्कूल में पढ़ रहा है। बड़े  सपने लाद दिये हैं, तो किस अधिकार से देखें कि बस्ते में ड्राइंग बाक्स  है या ड्रग की पुड़िया? उद्देलित होकर या आक्रोश दर्शा कर हम अपने दायित्व से नहीं बच सकते।

ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति से बचने के लिए बच्चों का सुखद व सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करने में पालक, शिक्षक, समाज व स्वयं बच्चों को समन्वित प्रयास करने होंगे। क्योंकि बच्चों के उज्ज्वल भविष्य में ही परिवार का, समाज का, राष्ट्र का व विश्व का उज्जवल भविष्य छिपा है। केवल अपेक्षा नहीं अपने दायित्व भी समझने होंगे। किसी मशहूर शायर का यह शेर ऐसे समय बहुत याद आता है ---
"उसको क्या हक है कि क़तरे से समंदर माँगे,
जिसने सिखलाया नहीं कतरे को दरिया होना।"
              #राजेंद्र श्रीवास्तव #