1- गीत
कैसे टूटेगा 'अनबोला' ।
मैने ऐसा कुछ न बोला
जो तुमने कर लिया अबोला।
ऐसे मौन साध लेने से -
कैसे टूटेगा 'अनबोला' ।
बहुत हुआ, छोड़ो यह गुस्सा
बैठो, तनिक निकट तो आओ।
हमसे क्यों इतनी नाराजी?
कोई कारण तो बतलाओ।
प्रेम-सुधा रस की प्याली में
क्योंकर यह रूखापन घोला।
हाव-भाव संकेतों से ही-
वजह रूठने की बतला दो।
कैसे होगा शाँत तुम्हारा -
क्रोध! कृपा करके बतला दो।
अब ज्यादा मत मुझे झुलाओ -
दुविधा का यह मौन हिंडोला।
ऐसा न हो, समाधान बिन
बढ़ कर कोई कलह ठन जाये।
चलो हँसो, इससे पहले कि-
दुख की बड़ी वजह बन जाये।
कब पिघलेगा मीत तुम्हारा -
यह निश्छल कोमल 'मन'भोला।
2- (सजल)
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तथाकथित इन अवतारों को पहचानो,
उग आई खरपतवारों को पहचानो।
'मुख में राम बगल में छुरी' छिपाए हैं,
इन मृदुभाषी मक्कारों को पहचानो।
मीठे बोल बोलने वाला मीत नहीं,
मतलब के झूठे यारों को पहचानो।
झोंका एक हवा का बाहर कर देगा,
दबे राख में अंगारों को पहचानो।
लोहा गरम देखकर ही वह पीटेंगे,
हाथ लिए घन, लोहारों को पहचानो।
सीधी सच्ची खरी-खरी लिखने वाले,
कलमकार, रचनाकारों को पहचानो।
आशा भरी नजर से तुमको ताक रहे,
मदद माँगते, लाचारों को पहचानो।
3-गीत
मन में हाहाकार मचा है।
सबने अपने-अपने ढँग से
अभिनय का संसार रचा है।
मुख मंडल पर शाँत सरोवर
मन में हाहाकार मचा है।
कहीं खोगया वह अपनापन
अंजाने ही मिल जाता था।
नेह बरसता जब नयनों से
हृदय कमल सा खिल जाता था।
स्वारथ की संकीर्ण सोच में -
अब मानव-मन रचा-पचा है।। सबने अपने...
हँसी-ठिठोली, मान-मनौवल
गल-बहियाँ का गया जमाना।
शेष रह गया हाय-हलो कह
हौले से आगे बढ़ जाना।
'कम चीनी की' चाय 'हाफ कप'
सा फीका व्यवहार बचा है।। सबने अपने...
जीवन की आपाधापी में
टूट रहे सब रिश्ते-नाते।
लक्ष्य प्राप्ति की प्रत्याशा में
दिशा-हीन से दौड़े जाते।
पीछे छूट गये अपनों की
किंचित कहीं नहीं चर्चा है।। सबने अपने....
4- 'गजल'
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लोग कहते हैं मनचला दिल का
है मगर वह बहुत भला दिल का।
पूछते वो, चुरा लिया जिसने-
हाल क्या है जरा बता दिल का।
सोच कर ही कदम बढ़ाना तुम
है तुम्हारा मुआमला दिल का।
आँख से आँख रोज मिलती थी,
आज दिल से है सामना दिल का।
हाल अपना उसे बयाँ कर दो-
हाँ उसे भी चले पता दिल का।
माँग लो दिल, दिया जिसे, तुमने -
आज देकर के बास्ता दिल का।
आशिकों के लिए बराबर है
जीतना और हारना दिल का।
5-दीवारें (नवगीत)
दीवारें आपस में ही
बतियाती रहती हैं।
मैं बैठा रहता हूँ,
मुझसे बात नहीं करतीं
दीवारें आपस में-
ही बतियाती रहती हैं।
बंद रखूँ दरवाजा,
कोई फर्क नहीं पड़ता -
यादें मन मर्जी से आती-जाती रहती हैं।
कभी कभी लगता है-
जैसे मुझको आँक रहीं।
और कभी लगता है,
मेरे मन में झाँक रहीं।
पढ़ लेती है अक्षर -
अक्षर मन की पुस्तक का-
मनचाहा आशय निकाल मुस्काती रहती हैं।
कोई आस और अब,
मन में रही नहीं बाकी।
कट जायेगा जीवन
बाकी यूँ ही एकाकी।
हर्ष-विषाद और सुख-
दुख की अब अनुभूति नहीं -
साँसें जीवन की अनुभूति कराती रहती हैं।
इनकी इस चुप्पी से-
अक्सर मैं घबराता हूँ।
फिर इन से ही जाकर
अपना सिर टकराता हूँ।
पत्थर की मूरत सी ,
ये संवेदनहीन रहीं-
कभी डरातीऔर कभी भरमाती रहती हैं।
6-तुम क्या जानो..... (नवगीत )
कभी बाँस की फाँस धंसी न-
कभी पाँव न फटी बिबाईं।
तुम क्या जानो पीर परायी।
तुम क्या जानो! क्या होता है-
राहों में अपनों को खोना।
पल-पल, फिर उनकी यादों में -
गरम आँसुओं से मुँह धोना।
आँखों ही आँखों में सारी-
रात गयी पर नींद न आई।। तुम क्या जानों.
तुम क्या जानो! सीढ़ी चढ़ना,
सिर पर रख कर भरी तगाड़ी।
हाड़ तोड़ महनत दिन भर की -
औनी-पौनी मिली दिहाड़ी।
पानी पीकर ही, धरती पर -
सो जाना, फिर बिछा चटाई।। तुम क्या जानो
तुम क्या जानो! आठ बरस के
बच्चे से बस्ता छिन जाना।
जूठे कप प्लेट, होटल में
धोकर पैसे चार कमाना
रोटी दोनों समय मिल गयी-
मगर पेट भर कभी न खायी।। तुम क्या...
तुमने शायद ही देखा हो-
खेतों में बीजों का बोना।
और बाढ़, सूखा, ओलो से -
पकी फसल का चौपट होना।
बोझ कर्ज का और बढ़ गया -
बिटिया की फिर रुकी सगाई।।तुम क्या जानो...
तुम क्या जानो! कई घरों का-
झाड़ू-पौंछा, बर्तन धोना।
और भूख से कहीं दुधमुँही-
बच्ची का सिसकी भर रोना।
ढली दोपहर लेकिन अब तक-
उसकी माँ वापस न आई।। तुम क्या जानो...
तुम क्या जानो क्या होता है -
चुनरी दागदार हो जाना।
जाने-अनजाने हाथों से -
या फिर तार-तार हो जाना।
दर्द बाँटने कोई न आया-
जग ने केवल हँसी उड़ाई ।। तुम क्या जानो...
#राजेंद्र श्रीवास्तव #